श्रीमदभगवत गीता | Bhagwat Geeta In Hindi | Geeta Saar

गीता सार

श्रीमदभगवत गीता | Bhagwat Geeta In Hindi

श्रीमद् भगवत गीता  हिंदुओं का एक ऐसा धर्म ग्रंथ, जो कई दशकों से समाज का मार्गदर्शन करती रही है| यह ज्ञान वह भंडार है जो व्यक्ति को नई दिशा और सत्यता का दिव्य ज्ञान देती है|

 श्री भगवत गीता उन अनमोल विचारों और सीखों का सार है जो श्री कृष्ण ने लगभग 5000 साल पहले कुरुक्षेत्र के युद्ध स्थल में अर्जुन को दिया थाभगवत गीता को गीता उपनिषद भी कहा जाता है जिसमें लगभग 700 श्लोकों का संग्रह है

श्री भगवत गीता की कई भाषाओं में व्याख्या की गई जिससे हर स्थानीय भाषा वर्गीय लोगों का कल्याण हो सकेइसमें 18 अध्याय सम्मिलित हैं जो ज्ञान के उस भंडार से भरे हैं, यदि जीवन में उतार लिए जाएं तो व्यक्ति का कल्याण और  आत्म बोध (Self Realization) निश्चित है |

गीतासार, महाभारत का वह धर्मयुद्ध था जो धर्म और अधर्म के बीच लड़ा गया  था तथा जिसमें एक तरफ पांडव और दूसरी तरफ कौरव थे |  जहां कौरव पांडवों का सब कुछ हड़पना चाहते थे और सुई की नोक के बराबर भी देने से भी मना  कर रहे थे, वहां श्री कृष्ण ने शांति दूत बनकर कौरवों के सामने शांति का  प्रस्ताव रखा लेकिन कौरवों का मत उनके  बिल्कुल विपरीत था| 

 कौरवों के मनमाने रवैए और अत्याचार के खिलाफ युद्ध का होना निश्चित था|

श्री कृष्ण ने अपने दिव्य ज्ञान के द्वारा गीता के अनमोल वचनों को अपने मुख प्रकट किया और अर्जुन का सारथि बनना स्वीकार किया |

जब अर्जुन अपनों के खिलाफ युद्ध ना करने पर विवश और विचलित थे, तब श्री कृष्ण ने अर्जुन को जीवन की सत्यता का बोध कराया| 

श्री भगवत गीता उस औषधि की तरह है जो अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करती है और ज्ञान के प्रकाश को उजागर करती है|  

दोस्तों श्री भगवत ज्ञान बस एक धर्म ग्रंथ नहीं बल्कि उस Manual की तरह है  जो व्यक्ति को जीवन जीने की सही कला भी सिखाती है, जहां व्यक्ति आज चिंताओं, निराशाओं और अवसादों ( Depression) से घिरा हुआ है यही गीता के उपदेश उसको इस गंभीर स्थिति से निकालने में सहायक सिद्ध होते हैं | 

आज हम  सरल युक्ति के माध्यम से गीता सार  के उन्ही अध्यायों का निचोड़ आपके सामने प्रस्तुत करेंगे जिससे आप इस काल्पनिक दुनिया से बाहर निकलकर जीवन के रहस्यों को जानकर  आस्था से भरपूर अपना जीवन बिता पायंगे |

Geeta Saar In Hindi

 गीता  सार | Geeta Saar Hindi

 

आत्मा का बोध (Soul Spirit realization)

 गीता सार में श्री कृष्ण ने आत्मा के  सत्य को उजागर कर हमको आत्मा की सच्चाई  से अवगत कराया|

जब अर्जुन युद्ध से चिंतित अपनों पर बाण चलाने पर अविवश होकर भ्रमित थे तब श्री कृष्ण ने अपने दिव्य ज्ञान द्वारा अर्जुन को   आत्मा के रहस्यों का बोध कराया | 

आत्मा के सन्दर्भ में श्रीकृष्ण ने आत्मा के दो रूपों परमात्मा और अणु- आत्मा तथा आकार पर चर्चा की है जो एक बाल के छोर  के 10,000 वें  हिस्से के बराबरहै | यही अणु-आत्मा अर्जुन के अंदर भी है जो विचलित है और जिसे श्री कृष्ण अपने उपदेशों द्वारा प्रकाशित किया |

आज हम सबने अपने शरीर को ही सच और सब कुछ मान लिया है जिसके चलते थोड़ी सी तकलीफ हो जाने पर हम चिंतित हो जाते हैं जो हमारे दुख का कारण बनती है और इस शरीर की संतुष्टि के लिए व्यक्ति रात दिन पापों की ओर बढ़ रहा है लेकिन जीवन की सच्चाईयो  से अनजान है | 

श्री कृष्ण ने  इस शरीर को मात्र एक वस्त्र की तरह बताया है जिन्हें हम हर रोज बदलते हैं | ठीक इसी तरह आत्मा भी इस पुराने तथा व्यर्थ शरीर रूपी कपड़े को बदलती रहती है और नया भौतिक शरीर धारण करती है तथा  ईश्वर तक का सफर तय करती है |

श्री कृष्ण कहते हैं :

आत्मा तो किसी शास्त्र द्वारा काटी जा सकती है और  ही अग्नि से जलाई जा सकती है,  ही जल से भिगोई   और  ही वायु से सुखाई  जा सकती है|

इसी तरह ये शरीर भी हमारा नहीं है, न हम इस शरीर के हैं, यह तो बस उन पंच तत्वों ( पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश )से बना हुआ है जो अंत में उसी में मिल जायेगा|

फिर व्यक्ति कैसे इस शरीर को सब कुछ समझ लेता है या किसी को मार या मरवा सकता है|

ज़रूरत है आत्म मंथन और खुद को समझने की ताकि शरीर रूपी इस काल्पनिक दुनिया से बहार निकलकर आत्मा सा सच्चा ज्ञान  हो सके| 

सुख- दुःख की व्याख्या (Explanation Of Happiness And Sorrow)

गीता के उपदेश में इसका ख़ास महत्व है | आजकल इंसान  कहीं ना कहीं बहुत हताश और उदास  हैंहमेशा सुख की कामना रख दुख आते ही गंभीर और विचलित हो जाता  हैं|

आज हर इंसान अपनी खुशियों को सहूलियतों और अपनों से जुड़ाव में ढूंढता  है जो उसके दुःख का कारण बनती हैं |

व्यक्ति ने  खुद को अपने संबंधों  से इतना जोड़ दिया है कि यदि वह उससे  दूर हो जाएं तो वह  व्याकुल हो उठता  हैं और उनके वियोग में जीने की इच्छा तक को खत्म कर देता  हैं जो इस सुख -दुख की व्याख्या से बिल्कुल विपरीत है| 

Bhagwat Geeta का माध्यम से श्री कृष्ण ने  सुख-दुख के संबंध में गहरा प्रकाश डाला है और उन लोगों को विशेष सीख  दी है जो खुद को चीज़ों से जोड़ लेते हैं | श्री कृष्ण कहते हैं :

जीवन में कुछ भी तुम्हारा नहीं है, जो तुम्हारे  रोने का कारण बने, क्यूंकि इंसान न ही कुछ लेकर आया है जो उसने खो दिए और न ही उनसे कुछ पैदा किया है |  यह सब कुछ ईश्वर ही तत्वों से जन्मा है और उसी में मिल जाएगा |

इंसान खाली हाथ ही आया है और खाली हाथ इस दुनिया से चला जाएगा|  आज जो किसी एक का  है वह कल किसी और का होगा ; फिर परसों किसी और का, क्योंकि  परिवर्तन  ही प्रकृति का नियम है|

श्री कृष्ण कहते हैं, सभी सुख- दुख बस सर्दी और गर्मी की तरह ही हैं जो आते-जाते रहते हैं लेकिन जो व्यक्ति न तो सुख आने पर बेहद खुश और न दुख आने पर विचलित होता है वही पूर्ण जानी है| 

अटल सत्य :

मौत ही जीवन का अटल सत्य है , जो इस जीवन में आया है उसको  एक दिन जाना ही पड़ेगा |

जो वयक्ति हर सुख दुःख में एक समान रहता है और  तो किसी के जीवित रहने या  मरने पर शोक से व्याकुल होते हैं वही मुक्ति योग्य है क्यूंकि जिसने जन्म लिया उसकी मृत्यु निश्चित है मृत्यु के बाद पुनर्जन्म निश्चित  है|

 

इंद्रियों का सार और नियंत्रण ( Essence And Control Of The Senses)

श्री  गीता सार   के माध्यम से  इंद्रियों पर दिया गया सन्देश अधबुध है क्यूंकि आज हर व्यक्ति इंद्रियों के वश में रहकर काम करता है और अपराध तक को जन्म दे बैठता है |

इन्द्रियाँ ही हैं जो इंसान को विषयों ( काम , क्रोध, मोह , लोभ तथा अहंकार ) के पीछे भटकती हैं  और बुद्धि का विनाश करती हैं, जिससे इंसान वह दुष कर्म कर बैठता है जो बाद  में पछतावे का कारण  बनती है | 

गीता जी में 10 इन्द्रियों पर चर्चा की गयी है जैसे :

5 कर्म इन्द्रियाँ : हाथ, पैर , मुँह , गुदा और लिंग और इसी प्रकार 5 ज्ञानेद्रियाँ भी हैं जैसे : आंख , कान , नाक, जीभ और त्वचा |

श्री कृष्ण कहते हैं :

जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को खोल के भीतर संकुचित कर लेता है उसी तरह व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी भावनाओं पर पूर्ण संतुलन रखें और इंद्रियों से भटक कर विषयों के पीछे न भागे क्योंकि जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों को वश में कर लेता है वही पूर्ण चेतना में स्थिर होता है | 

क्रोध पर नियंत्रण

श्री कृष्ण ने गुस्से पर नियंत्रण रखने पर भी विशेष ज्ञान  दिया है क्योंकि क्रोध  व्यक्ति की बुद्धि का नाश करता है और बुद्धि का नाश होने पर व्यक्ति का सर्वनाश हो जाता है |

अर्थात, मोह ( किसी वस्तु या व्यक्ति की इच्छा ) से काम उत्पन्न होता है; काम की पूर्ति ना होने पर क्रोध उत्पन्न होता; और क्रोध उत्पन्न होने पर स्मरण शक्ति भ्रमित ( Memory Confused) हो जाती है;  स्मरण शक्ति भ्रमित होने पर  बुद्धि का नाश हो जाता है और जब बुद्धि का नाश हो जाता है तो  व्यक्ति का विनाश निश्चित है| 

इसलिए व्यक्ति को अपनी इच्छाओं को सीमित ( Limited Desires) रख गुस्से पर नियंत्रण रखना चाहिए क्योंकि कमान से निकला तीर और मुंह से निकले शब्द कभी वापस नहीं आते जो बाद में व्यक्ति के विनाश के कारण बनते हैं| 

मन की चंचलता ( Fickle Mind)

 मन के हारे हार है, मन के जीते जीत अर्थार्थ  जिसने मन को जीत लिया उसने परमात्मा को जीत लिया | आज व्यक्ति मन के वशीभूत होकर खुद को घोर अंधकार में धकेल रहा है|

श्री  कृष्ण ने इस भौतिक शरीर को रथ की तरह बताया है जिसके घोड़े इंद्रियां हैं और मन सारथि , जो इंद्रियों के भटकाव के कारण विषयों  के पीछे भागता है| श्री कृष्ण कहते हैं जिसने मन को जीत लिया, मन उसके लिए सर्वश्रेष्ठ मित्र है और जो ऐसा  न कर पाया उसके लिए मन उसके लिए शत्रु |

अनियंत्रित मन ही है जो व्यक्ति  को आलसी बनाता है और आलसी व्यक्ति जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ सकता | 

अतः व्यक्ति को चाहिए की वो मन के भटकाव में न आये और बुद्धि के द्वारा मन पर काबू पाए जिसका एक मात्रा मार्ग है ज्ञान | 

 

ज्ञान दर्शन (The Real Knowledge)

गीता सार का उद्देश्य है व्यक्ति के ज्ञान में बढ़ोतरी  जो व्यक्ति को जीवन की सच्चाई का बोध कराती है जिससे वह मन पर नियंत्रण कर पाता है| 

ज्ञान वह शक्ति है जो इंसान की तर्क क्षमता बढाती है, सच और झूठ में भेद बताता है और उसके लिए  मोक्ष का रास्ता खोलती  है , आज ज्ञान के आभाव में ही अपराधों  को जन्म देकर  इस भौतिक संसार को ही सब कुछ मान लिया जा रहा है |

Bhagwat Geeta के माध्यम से  श्री कृष्ण ने  गुरु की  विशेष महिमा बताई  है और गुरु के सानिध्य में ज्ञान को प्राप्त करने पर जोर दिया है | क्यूंकि गुरु ही वह सेतु है जो एक भक्त को ईश्वर से जोड़ता है,  व्यक्ति को अच्छे -बुरे और सत्य-असत्य का भेद बताता है |

इसीलिए व्यक्ति को चाहिए कि जीवन में गुरु को धारण करें , गुरु के महत्व को समझें , अपने जीवन की हर समस्या उनसे शेयर करें और आध्यात्मिक उन्नत्ति कर मोक्ष को प्राप्त करें | 

 

कर्मों का विधान ( The Karma)

 श्री कृष्ण ने कर्मों को सर्वश्रेष्ठ बताया है जो संपूर्ण गीता सार  का मुख्य आधार बिंदु है क्योंकि जब अर्जुन युद्ध भूमि में  भ्रमित और आशाहीन थे तब श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपने दिव्य ज्ञान द्वारा कर्म की महत्वता बताई |

 आज इंसान जो कुछ भी है सिर्फ अपने अच्छे- बुरे कर्मों के आधार पर हैं | आज कोई भी जीव या मानव जाति बिना कर्म किये इस माया रुपी संसार में  नहीं रह सकती | 

श्री कृष्ण कहते हैं :

व्यक्ति को अपना नित्य कर्म करना चाहिए क्योंकि बिना कर्म किए शरीर अपना निर्वाह नहीं कर सकता  क्योंकि सांस लेना, देखना ,सुनना और  बोलना कर्म ही तो है | 

कर्म ही हैं जिनके आधार पर व्यक्ति पशुता के स्तर से उप्पर उठ सकता है और जीवन का आनंद ले सकता है | 

निष्काम कर्म की सीख

श्री कृष्ण कहते है व्यक्ति को  लाभ-हानि , जीत-हार , यश-अपयश की चिंता किये बिना सिर्फ निष्काम कर्म करना चाहिए और फल की इच्छा नहीं करनी चाहिए , क्यूंकि इंसान के हाथ में सिर्फ कर्म करना है बाकी फल देना ईश्वर के हाथ में हैं|

लेकिन आज हर इंसान सिर्फ फल की इच्छा से ही कर्म करता है जो कि निष्काम भाव से किया गया कर्म नहीं है | व्यक्ति को चाहिए वह कर्मो के खेल को समझे और उन  सभी कर्मो को  ईश्वर को समर्पित कर परम  शान्ति प्राप्त करे  | 

 

योग और योगी की व्याख्या ( Yoga And Yogi Explanation)

श्री भगवत गीता उपदेश  में श्री कृष्ण ने योग और योगी की महिमा को भी बताया है जिसमें हर व्यक्ति को योग और योगी के महत्व का सही ज्ञान हो सके |

श्री कृष्ण कहते हैं :

 सदैव चंचल रहने वाली इंद्रियों को वश में कर मन को एकाग्र करना ही योग है और जो व्यक्ति विषयों के भटकाव से परे रहकर हमेशा संतुष्ट रहता है वही असली योगी है | 

योगाभ्यास ही वह माध्यम  है जो परमात्मा से भेंट करता है  है जिसके लिए उन्होंने योग की सही विधि का भी बहुमूल्य ज्ञान दिया है| जैसे :

योगाभ्यास के लिए व्यक्ति को पवित्र स्थान का चुनाव करना चाहिए और फिर उस स्थान पर कुशा बिछाकर उसके ऊपर मुलायम वस्त्र बिछाना चाहिए | आसन न तो बहुत ऊंचा और न ही बहुत नीचा होना चाहिए तथा इंद्रियों को एकाग्र करके अपने मन को एक बिंदु पर टिका कर योगाभ्यास करना चाहिए| 

 एक अभ्यासी को  चाहिए कि वह अपने शरीर और  गर्दन को सीधी  रखें, नाक के अगले छोर पर दृष्टि लगाएं और विषयों  से मुक्त होकर मेरा( श्री कृष्ण ) चिंतन करें तथा मुझे  अपना चरम लक्ष्य बनाएं

 एक सफल योग अभ्यास के लिए हम किसी योग गुरु का भी सहारा ले सकते हैं जिससे हमारा आभा मंडल मजबूत होगा और चेहरे पर  तेज़ बढ़ेगा और हम ईश्वर तत्व को मह्सूस कर अध्यात्म की ओर बढ़ पाएंगे |

 

 भक्ति सार ( Devotional Essence)

श्री गीता सार में भक्ति  का अपना विशेष  महत्त्व है क्यंकि आज हम सभी कहीं न कहीं ईश्वर के प्रति भक्ति भाव रखते हैं और जीवन में शांति लाना चाहते हैं जिसके लिए हम अपनी इच्छा अनुसार देवताओं को पूजते हैं और अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थनाएं करते हैं| 

Geeta Saar In Hindi के  इसी के सन्दर्भ में  श्री कृष्ण ने भक्ति के तरीकों और उसके कर्मफलों को उजागर किया | श्री कृष्ण कहते हैं:

जब कोई व्यक्ति किसी देवता को पूजा करता  है तो मैं उसकी श्रद्धा का सम्मान कर उसकी श्रद्धा को उसी विशेष देवता में स्थिर कर देता हूँ  जिससे वह उस देवता की पूजा कर सके लेकिन यह सभी लाभ मेरे द्वारा(श्री कृष्ण) ही दिए जाते हैं|

श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं , जो लोग देवताओं की पूजा करते हैं उन्हीं को प्राप्त होते हैं तथा उन्हीं के लोकों में जाते हैं |

जो मेरी  पूजा करते हैं  तथा सभी इच्छाओं से परे आखिरी समय में मेरा स्मरण करते है वे तुरंत ही मेरे  परमधाम को प्राप्त होते  हैं|

 श्री कृष्ण आगे कहते हैं जो देवताओं की पूजा करते हैं वे देवताओं के बीच जन्म लेते हैं, जो पितरों की पूजा करते हैं वह पितरों के पास जाते हैं और  जो भूत- प्रेतों की उपासना करते हैं उन्हीं के बीच जाते हैं और जो मेरी  पूजा करते हैं वे मेरे साथ ही निवास करते हैं|

अत: हमे चाहिए हम भक्ति सार को समझे और अपनी ज़रूरतों के अनुसार अपने जीवन में अमल करे, क्यूंकि भक्ति ही है जो हमको मानसिक शान्ति , कामनाओं की पूर्ति  और इस जनम मरण के खेल से हमारा पीछा छुड़ाती हैं | 

 श्री कृष्ण की महिमा ( Glory Of Lord Krishna)

श्री भगवत गीता के माध्यम से श्री कृष्ण ने अपनी महिमा का गुणगान  किया ताकि लोग उनके असली रूप से परिचित हों  और अपनी बुद्धि के अंधकार को दूर कर पाएं |  जो लोग श्रीकृष्ण को बस महापुरुष मानते हैं वह मूर्ख हैं क्योंकि सिर्फ वही जगत में व्याप्त हैं स्वयं साक्षात् ईश्वर हैं |

श्रीकृष्ण की महिमा बताने का कारण है अज्ञान को दूर कर ज्ञान  में बढ़ोतरी, क्यूंकि न कोई बड़ा है न ही कोई छोटा, सब उन्हीं  के रूप हैं  जो उनमे ही विलीन हो जाते हैं | श्री कृष्ण कहते हैं:

मैं अजन्मा, अनादि और समस्त लोको का स्वामी हूँ |

मैं ही समस्त जीवों के हृदय में परमात्मा हूं, समस्त जीवों का आदि, मध्य और अंत हूं|

 मैं ही विष्णु, तेजस्वी सूर्य, तथा नक्षत्रों में चंद्रमा हूं|

 मैं  समस्त रूद्र में शिव हूं, संपत्ति में कुबेर, वसुओं में अग्नि, पर्वतों में मेरु  हूं|

 मैं  वरुण देव हूं, हथियारों में वज्र, गायों में सुरभि, प्रेम के कामदेव तथा मृत्यु में यमराज हूँ |

 भक्तों में प्रहलाद हूं काल हूं, पशुओं में सिंह तथा पक्षियों में गरुड़ हूँ |

 मैं ही शस्त्र धारियों में राम, मछलियों में मगर और नदियों में गंगा हूं|

 मैं ही  तेजस्वी में तेज, विजय, साहस और बलवानों का बल हूँ | 

 मैं ही वासुदेव तथा पांडवों में अर्जुन तथा मुनि में व्यास हूँ  इत्यादि|

 दोस्तों,वैसे तो श्री कृष्ण की महिमा का बोध अनंत है लेकिन जो सिर्फ उनको बस एक मानव समझते थे , उनके लिए ये प्राप्त व्याख्या है|

श्री कृष्ण की महिमा को जानना मानव समाज के लिए अति आवश्यक है इसलिए श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं: मेरी भक्ति करो; मुझे ही पूछो मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूंगा और इसमें तनिक मात्र भी संशय नहीं |

 

मानव  प्रवित्तियाँ (Human Instincts)

भगवत गीता  के सार के माध्यम से हमें श्री कृष्ण ने मानव की विभिन्न प्रवित्तियों से भी अवगत कराया है जिससे व्यक्ति खुद को पशुता के स्तर से उठाकर  मोक्ष के द्वार तक लेजा सकता है |

गीता जी में तीन प्रकार की प्रवतियाँ बताई गयी हैं  जिसमे सभी मानव जाती सम्मलित है जैसे : सतोगुणी , रजोगुणी और तमोगुणी |

सतोगुणी प्रवृति :

यह सबसे शुद्ध प्रवृति मानी जाती  हैयह मनुष्य के पाप कर्मों से मुक्त करने वाली होती हैजो लोग इस गुण में होते हैं वे सुख तथा ज्ञान  जाते हैं| सेवा, क्षमा , कल्याण, दयावैराग्य इन्हीं के गुण हैं| शुद्ध शाकाहार (बिना लहुसन, प्याज़ ) इनके भोजन की विशेषता है |

 रजोगुणी  प्रवृति : 

इसमें वो लोग होते हैं जिनमें असीम इच्छाएं और आशाएं होती हैं जिसके कारण जीव कर्मों से बंध जाता है| नमकीन तथा मसालेदार भोजन इसकी विशेषता है |

 तमोगुणी  प्रवृति :

इस प्रकृति के लोग मोह के अधीन होते हैं आलस, नींद, अज्ञानता औरअहंकार इनके विशेष गुण होते हैं| अधिक मसालेदार तथा मांसाहार का सेवन भी इसी प्रवृति से जुड़ा हैं|

 श्री कृष्ण कहते हैं सद्गुणी मनुष्य को सुख सेबांधता है, रजोगुण कर्म से और तमोगुणी मनुष्य अज्ञान से पीड़ित होकर मूर्खता से बांधता है|

सद्गुणी मनुष्य उच्च लोकों जाता है, रजोगुण जन्म मरण के बीच इस पृथ्वी लोक पर वापस जाता है और तमोगुण पशुओं की योनियों में विचरता है|

इसिलए यदि व्यक्ति  पशुता के स्तर से उठकर ज्ञान की और बढ़ना चाहता हैं तो उसे चाहिए  अपने  गणों में बदलाव लाये , खाने की आदतों और प्रवृति को सुधारें , जिससे उसकी  अज्ञानता का नाश हो और वह इश्वरिये तत्व के करीब पहुंच पाए तथा जीवन की उच्चता को प्राप्त करें| 

धर्म रक्षक ( Religion Protector)  

श्री कृष्ण ने गीता सार के माध्यम से अर्जुन को धर्म की रक्षा का भी संदेश दिया है जिसमें वह कहते हैं जब-जब धर्म की हानि होगी तब तक मैं इसी तरह धरती पर अवतार लेता रहूंगा और इस  लोक की दुष्टों से  रक्षा कर मानव जाति का कल्याण करता रहूंगा| 

आज धरती पर पाप दिन प्रतिदिन बढ़ता चला जा रहा है और व्यक्ति अपने लाभ के  लिए किसी भी हद तक गिरकर कमज़ोरों का शोषण कर रहा है| 

आज पाप का घड़ा इतना बढ़ गया है कि हम सभी घोर कलयुग की तरफ बढ़ रहे हैं और यदि यही स्थिति रही तो श्री कृष्ण फिर अपने अगले  (कलगी)  अवतार में जन्म लेकर इस पवित्र धरती को पापियों से विहीन कर धर्म की स्थापन करेंगे और पुन: सतयुग का प्रारम्भ करेंगे |  

 

 

निष्कर्ष (conclusion) :

दोस्तों,  श्री भगवत गीता एक ऐसा  धर्म ग्रन्थ जो हमारे जीवन  आधार है और हमे जीने की प्रेरणा देती है|

 आपने जाना कैसे श्री कृष्ण ने अर्जुन के द्वारा हम मानव जाती को एक अद्भुत गीता उपदेश दिया, जिसे हम जीवन में उतारकर सभी समस्यायों का निवारण कर दूसरों को भी प्रेरित कर सकते हैंजिससे हमारी आने वाली पीढ़ियां ज्ञान, सद्गुण, कर्मशील, संयमित, आत्मविश्वासी , दृढ़ संकल्प से भरपूर भक्तिवान बनेंगी और अपने के साथ समाज का भी कल्याण करेंगी |

मैं आशा करता हूँ सरल युक्ति के माध्यम से लिखा मेरा लेख “Bhagwat Geeta ” आपको पसंद आया होगा और इसने भगवतगीता के हर पहलू को Cover किया होगा |

आप “ Geeta Saar ” को शेयर भी कर सकते हैं और अपने सुझाव मुझको भेज सकते हैं जिससे मुझे और बेहतर लिखने की प्रेरणा (Inspiration) मिलेगी|

 

हमेशा खुश रहिये और मुस्कुराते रहिये ||

धन्यवाद |

 

 

 

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